फलित ज्योतिष में वर्णित अनेकग्रहयोगो में राशि–परिवर्तन योग एकबड़ा महत्वपूर्ण और ग्रहस्थिति के फलपर बहुत गहन प्रभाव डालने वाला योगहै, कुंडली में ग्रहों की कुछ विशेष स्थितिसे राशि–परिवर्तन योग बनता है कुंडलीमें जब कोई भी दो ग्रह एक दूसरे कीराशि में स्थित हों तो इसे राशि–परिवर्तनयोग कहते हैं उदाहरण के तौर पर जैसेचन्द्रमाँ धनु राशि (बृहस्पति की राशि) मेंहो और बृहस्पति कर्क राशि (चन्द्रमाँ कीराशि) में हो तो यहाँ चन्द्रमाँ औरबृहस्पति में राशि परिवर्तन हो रहा हैराशि परिवर्तन किस स्थिति में कैसाप्रभाव देगा इसके लिए ग्रहों का भावऔर भावेश की दृष्टि से भी आंकलनकरना होता है अर्थात दो ग्रह किन भावोके स्वामी होकर आपस में राशिपरिवर्तन योग बना रहे हैं।
राशि परिवर्तन योग को मुख्य रूप सेतीन स्थितियों में बाटा गया है।
महायोग – जब कुंडली मेंशुभ भावों (केंद्र,त्रिकोण,धनभाव, लाभ स्थान) के स्वामियोंअर्थात शुभ भावेशों का आपस मेंराशि परिवर्तन होता है तो इसेमहायोग कहते हैं जैसे लग्नेशपंचम भाव में हो और पंचमेशलग्न में स्थित हो तो यहाँ लग्न(प्रथम भाव) और पंचम भाव केस्वामी एक दूसरे के भाव में स्थितहैं जिससे यह राशिपरिवर्तनमहायोग की श्रेणी में आएगा इसीप्रकार धनेश दशम भाव में औरदशमेश धन भाव में हो, चतुर्थेशनवम भाव में और नवमेश चतुर्थभाव में हो तो इस प्रकार शुभभावो के स्वामियों में हुआ राशिपरिवर्तन महायोग कहलाता है।महायोग को बहुत शुभ फल देनेवाला माना गया है इससे कुंडलीका बल और साकारात्मकपरिणाम बढ़ते हैं महायोग में जिनदो भावों के स्वामियों में राशिपरिवर्तन होता है उन दोनों भावोंका बल बहुत बढ़ जाता है जिससेउस भाव से सम्बंधित कारक तत्वोंकी जीवन में अच्छी प्राप्ति होती हैजैसे यदि धनेश और दशमेश मेंराशि परिवर्तन हो तो ऐसे में व्यक्तिकी आजीविका भी अच्छी होगीकरियर में अच्छी सफलता मिलेगीतथा धन की स्थिति अर्थातआर्थिक पक्ष भी अच्छा प्राप्तहोगा, यदि यदि लग्नेश औरपंचमेश का राशि परिवर्तन हो तोइससे जीवन में अच्छा स्वास्थ, प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अच्छी शिक्षा औरअच्छे संतान सुख की प्राप्ति होगीअतः कुंडली में महायोग का बननाकुंडली के बल को बढाकर शुभपरिणाम देता है। राज योग की कुछ स्थितियां भी महायोग की श्रेणी में ही बनती हैं कुंडली में दशमेश का त्रिकोणेश अर्थात लग्नेश, पंचमेश और भाग्येश के साथ राशिपरिवर्तन राजयोग माना जाता है और व्यक्ति को समृद्धि प्रदान करता है तो राज योग की यह स्थिति भी महायोग की श्रेणी में ही आती है।दैन्य योग – यदि कुंडली पापया दुःख भावों के स्वामियों(षष्टेश,अष्टमेश,द्वादशेश) का शुभभावों के स्वामियों के साथरशिपरिवर्तन हो तो इसे दैन्य योगकहते हैं उदाहरण के तौर पर यदिअष्टमेश लग्न में स्थित हो औरलग्नेश अष्टम भाव में हो तो यहाँअष्टमेश (दुःख भाव का स्वामी) और लग्नेश (शुभ भाव का स्वामी) के बीच राशि परिवर्तन हो रहा हैजिससे यह रशिपरिवर्तन दैन्य योगकी श्रेणी में आता है इसी प्रकारपंचमेश और षष्टेश काराशिपरिवर्तन, धनेश औरद्वादशेश का राशि परिवर्तन अर्थातकिसी भी शुभ भावेश और पाप भाव के स्वामी का आपस में राशि परिवर्तन या एक दूसरे के भाव में बैठना दैन्य योग कहलाता है दैन्य योग को अच्छा नहीं माना गया है इससे संघर्ष की उत्पत्ति होती है कुंडली में दैन्य योग बनने पर शुभ भाव का स्वामी पाप भाव में होने और पाप भाव का स्वामी शुभ भाव में होने से वह शुभ भाव और उसका स्वामी पीड़ित हो जाते हैं जिससे शुभ भाव से सम्बंधित कारक तत्वों में हानि होती है और संघर्ष का सामना करना पड़ता है जैसे मन लीजिये किसी व्यक्ति की कुंडली में लग्नेश छटे भाव में है और षष्टेश लग्न में स्थित है तो यहाँ लग्नेश और षष्टेश का राशि परिवर्तन होने से लग्न और लग्नेश दोनों पीड़ित हो रहे हैं जिससे ऐसे में व्यक्ति को स्वास्थ सम्बंधित समस्याएं बहुत अधिक रहेंगी और जीवन में प्रसिद्धि प्रतिष्ठा यश आदि की कमी रहेगी। तो दैन्य योग बनना संघर्ष उत्पन्न करता है।खल-योग – कुंडली में जब तीसरे भाव के स्वामी का किसी भी शुभ भाव (केंद्र, त्रिकोण लाभ धन आदि) के स्वामी के साथ राशि परिवर्तन हो तो इसे खल योग कहते हैं उदाहरण के तौर पर यदि लग्नेश तीसरे भाव में और तृतियेश लग्न में हो, पंचमेश तीसरे भाव में और तृतियेश पंचम भाव में हो, दशमेश तीसरे भाव में और तृतियेश दशम भाव में हो तो यह राशि परिवर्तन खल योग की श्रेणी में आता है खल योग का परिणाम दैन्य योग की तरह अति नकारात्मक तो नहीं होता पर दैन्य योग को भी अच्छा नहीं माना गया है इसमें तृतियेश का जिस शुभ भाव के स्वामी से राशि परिवर्तन होता है उस भाव के कारक तत्वों की प्राप्ति में संघर्ष या अधिक पुरुषार्थ करना पड़ता है जैसे यदि दशमेश और तृतियेश का राशिपरिवर्तन हो तो ऐसे में व्यक्ति को अपनी आजीविका या करियर क
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