मंगलवार, 1 अगस्त 2017

राजनीति में सफलता के ग्रहयोग


राजनीति में सफलता के ग्रहयोग -

आज के समय में राजनेताओं को वही महत्व प्राप्त है जो प्राचीन समय में एक राजा का होता था।  किसी भी देश या  राज्य की उन्नति और समृद्धि उसके राजनैतिक नेताओं की सूझ-बूझ, इच्छाशक्ति और कार्यकुशलता पर निर्भर करती है वहीँ जनता के मध्य और विभिन्न प्रतियोगियों के साथ एक सफल राजनेता बनना भी किसी चुनौती से कम नहीं है एक सफल राजनेता में जहाँ अच्छी बौद्धिक कुशलता, वाक्शक्ति, अच्छी निर्णय-शक्ति आदि गुण होने चाहियें वहीँ उसमे जनता के बीच जाकर उनका विश्वाश जीतने की कला भी होनी चाहिये, तो कौनसे ग्रह और ग्रहस्थितियां एक व्यक्ति को राजनीति में सफलता दिलाते हैं आइये जानते हैं –

"ज्योतिष में सरकार, सरकारी कार्य, सत्ता और राजनीती के लिए "सूर्य" को ही कारक माना गया है "शनि" जनता और जनता से मिलने वाली सपोर्ट का कारक है इसी तरह कुंडली का "चतुर्थ भाव" भी जनता की सपोर्ट को दिखाता है इसके आलावा कुंडली का छठा भाव प्रतिस्पर्धा और विरोधियों तथा तीसरा भाव अपनी शक्ति और पराक्रम का कारक होने से राजनीती में अपनी सहायक भूमिका निभाते हैं।"

सूर्य - राजनीति के क्षेत्र में सफलता के लिए सूर्य ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रह है क्योंकि सूर्य को ही सरकार और सत्ता का कारक माना गया है इसके आलावा शाशन की कुशलता, प्रसिद्धि, प्रीतिष्ठा, इच्छाशक्ति और यश का का कारक भी सूर्य ही होता है और राजनीती में आगे बढ़ने के लिए प्रसिद्धि , प्रतिष्ठा का होना बहुत आवश्यक है इसलिए भी राजनीती में सफलता पाने के लिए कुंडली में सूर्य का बलि होना बहुत आवश्यक है।

शनि - शनि को जनता और जनता से मिलने वाली सपोर्ट का कारक माना गया है और सक्रीय राजनीति में सफल होने के लिए जनता का साथ मिलना बहुत आवश्यक है अतः कुंडली में बलवान शनि जनता का सहयोग दिलाकर व्यक्ति को सफल राजनेता बनाता है।

चतुर्थ-भाव - कुंडली का चौथा भाव भी जनता का कारक है अतः राजनीती में सफलता के लिए कुंडली के चतुर्थ भाव और चतुर्थेश का बलि होना भी बहुत आवश्यक हैl

षष्ठ और तृतीय भाव - कुंडली का छठा और तीसरा भाव प्रतिस्पर्धा की क्षमता और विरोधियों पर विजय को दर्शाता है अतः कुंडली में इन दोनों भावों का बलि होना भी राजनीती में सहायक होता है तथा विरोधियों पर विजय दिलाकर प्रतिस्पर्धा में आगे रखता है।

निष्कर्ष - उपरोक्त तथ्यों में हमने देखा के राजनैतिक सफलता के लिए मुख्य घटक सूर्य , शनि और चतुर्थ भाव ही होते हैं सूर्य सीधे-सीधे सत्ता और राजनीति का कारक है ही तथा शनि व् चतुर्थ भाव जनता का सहयोग दिलाते हैं अतः निष्कर्षतः राजनैतिक सफलता के लिए कुंडली में सूर्य , शनि और चतुर्थ भाव का अच्छी स्थिति में होना बहुत आवश्यक है।इसके अतिरिक्त राहु कूटनीति का ग्रह होने से बली या शुभ स्थिति में स्थित राहु की भी यहाँ सहायक भूमिका होती है। अब यहाँ एक महत्वपूर्ण बात और है राजनीति के क्षेत्र में आगे बढ़ने के भी दो मार्ग हैं एक सक्रीय चुनावी राजनीति और दूसरी संगठन की राजनीति, आप राजनीती के क्षेत्र में किसी भी प्रकार जुड़े हों सफलता के लिए कुंडली में सूर्य का अच्छा होना तो आवश्यक है ही परन्तु सक्रीय चुनावी राजनीती में सफल होने के लिए शनि और चतुर्थ भाव का बलि होना बहुत आवश्यक है।  जिन लोगों की कुंडली में शनि कमजोर या पीड़ित होता है उन लोगों को जनता का सहयोग न मिल पाने के कारण वे चुनावी राजनीती में सफल नहीं हो पाते अतः कमजोर शनि वाले लोगों को चुनावी राजनीती में ना जाकर संगठन में रहकर कार्य करना चाहिये।

राजनैतिक सफलता के कुछ विशेष योग -

1. यदि सूर्य स्व या उच्च राशि (सिंह, मेष) में होकर केंद्र, त्रिकोण आदि शुभ भावो में बैठा हो तो राजनीति में सफलता मिलती है।

2. सूर्य दशम भाव में हो या दशम भाव पर सूर्य की दृष्टि हो तो राजनीति में सफलता मिलती है।

3. सूर्य यदि मित्र राशि में शुभ भाव में हो और अन्य किसी प्रकार पीड़ित ना हो तो भी राजनैतिक सफलता मिलती है।

4. शनि यदि स्व, उच्च राशि (मकर , कुम्भ, तुला) में होकर केंद्र त्रिकोण आदि शुभ स्थानों में बैठा हो तो राजनीती में अच्छी सफलता मिलती है।
5.यदि चतुर्थेश चौथे भाव में बैठा हो या चतुर्थेश की चतुर्थ भाव पर दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को विशेष जनसमर्थन मिलता है।

6. चतुर्थेश का स्व या उच्च राशि में होकर शुभ स्थानं में होना भी राजनैतिक सफलता में सहायक होता  है।

7. बृहस्पति यदि बलि होकर लग्न में बैठा हो तो राजनैतिक सफलता दिलाता है।

8. दशमेश और चतुर्थेश का योग हो या दशमेश चतुर्थ भाव में और चतुर्थेश दशम भाव में हो तो ये भी राजनीती में सफलता दिलाता है

9. सूर्य और बृहस्पति का योग केंद्र ,त्रिकोण में बना हो तो ये भी राजनैतिक सफलता दिलाता है।

10. बुध-आदित्य योग (सूर्य + बुध) यदि दशम भाव में बने

कुंडली में इन योगों की वजह से होता है प्रेम विवाह





  कुंडली में  इन योगों की वजह से होता है प्रेम विवाह

1.  यदि पंचम सप्तम एवं नवम भाव या  भावेशो का  परस्पर संबंध हो यह संबंध युक्ति या दृष्टि से भी हो सकता है |

2. सप्तम भाव में शनि केतु भी प्रेम विवाह में सहयोग करते हैं |

3.  जब नवम एवं सप्तम भाव एवं उसके स्वामी तथा गुरु अशुभ ग्रह से प्रभावित हो |

4.  जब बारवा भाव चर राशि का ना हो और उसका संबंध लग्नेश और सप्तमेश के साथ हो या दृष्टि हो तो ऐसा जातक घर की परंपराओं का विरोध करके अन्य जाति विवाह कर लेता है |

5.  लग्नेश और सप्तमेश आठवें या पांचवे हो, या लग्नेश और पंचमेश सातवें हो, पंचमेश और सप्तमेश लग्न में हो, तो जातक मर्यादाओं का उल्लंघन करके बेधड़क विवाह कर लेता है |

6.  पांचवें स्थान में राहु हो और पंचमेश या सप्तमेश  भाग्येष शनि से पीड़ित हो या दृष्टि हो तो ऐसा जातक अन्य जाति में विवाह करता है |

7.  सप्तमेश और पंचमेश एवं शुक्र शनि या राहु के साथ हो या इनसे दृष्ट हो तो प्रेम विवाह निश्चित होता है |

8.  जब नवम भाव एवं सप्तम भाव एवं उनके स्वामी तथा गुरु या शुक्र अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो तो भी प्रेम विवाह निश्चित होता है |

9.  यदि पंचमेश लग्नेश और सप्तमेश तीनों का संबंध बारहवे स्थान में हो तो प्रेम विवाह अवश्य होता है |

10.  यदि पंचमेश और सप्तमेश लडकी का गुरू और लड़के का शुक्र यदि राहु के साथ बैठे हो या राहु दृष्टि हो तो ऐसे जातक का पति या पत्नी नीच विचारों की अथवा मलेच्छ होती है



वैभव प्रदाता शुक्र -

ज्योतिष में वैसे तो नव-ग्रहों में से प्रत्येक ग्रह का अपना अलग महत्व होता है प्रत्येक ग्रह हमारे जीवन के भिन्न भिन्न घटकों को नियंत्रित करता है परंतु नौ ग्रहों में से शुक्र ग्रह का हमारे जीवन में बड़ा ही विशेष महत्व है क्योंकि शुक्र हमारे जीवन के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है, शुक्र को ज्योतिष में ससमय और शुभ ग्रह माना गया है ज्योतिष में वर्णित में बारह राशियों में से वृष और तुला राशि पर शुक्र का आधिपत्य है मीन राशि में शुक्र उच्चस्थ तथा कन्या में नीचस्थ होता है शनि, बुध और राहु शुक्र के मित्र ग्रह हैं।
ज्योतिष में शुक्र को धन, सुख संपत्ति, घर, जायदात, भौतिक संसाधन, ऐश्वर्य, विलासिता, वैभव, आर्थिक उन्नति और भोग का कारक माना गया है, शुक्र ही हमारे जीवन के सभी भौतिक संसाधनों और समृद्धि को नियंत्रित करता है इसलिए आज के समय शुक्र सर्वाधिक महत्व रखने वाला ग्रह माना जाता है जिन लोगों की कुंडली में शुक्र बली स्थिति में होता है उन्हें जीवन में अच्छी आर्थिक स्थिति, संपत्ति ऐश्वर्य और वैभव की प्राप्ति होती है और यदि कुंडली में शुक्र कमजोर और पीड़ित स्थिति में हो तो ऐसे में जीवन में आर्थिक विकास नहीं हो पाता जीवन में सुख संसाधनों और धन से जुडी समस्यायें उत्पन्न होती हैं और व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करता है, जन्मकुंडली में बने अन्य शुभ योगों के होने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी तो हो सकती हैं पर जीवन में ऐश्वर्य और वैभव केवल बली शुक्र से ही प्राप्त होता है ,यदि कुंडली में शुक्र पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति समान्य आर्थिक स्थिति को ही प्राप्त कर पाता है जीवन में वैभव नहीं आ पात, और यदि कुंडली में शुक्र अति पीड़ित स्थिति में हो तो ऐसे में कुंडली में बने राजयोग भी निष्फल हो जाते हैं इसलिए कुंडली में राजयोग भी तभी अपना पूरा परिणाम देता है जब शुक्र भी शुभ स्थिति में हो। .............
यदि कुंडली में शुक्र स्व उच्च (वृष, तुला, मीन) राशि में हो और शुभ स्थानों (केंद्र, त्रिकोण, धन, लाभ स्थान) में हो तो ऐसे में व्यक्ति को अच्छी आर्थिक स्थिति प्राप्त होती है संपत्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन में वैभव की प्राप्ति होती है, यदि शुक्र केंद्र में (1,4,7,10 भाव) वृष तुला या मीन राशि में हो तो माल्वय योग का निर्माण होता है जो व्यक्ति को राजयोग तुल्य फल प्रदान करता है। शुक्र को कुंडली के बारहवे भाव में सर्वाधिक बली माना जाता है बारहवा भाव भोग का नियंत्रक भाव है तथा शुक्र भोग का नैसर्गिक कारक है इसलिए बारहवे भाव में स्थित शुक्र व्यक्ति को उच्च समृद्धि प्रदान करता है। पुरुष जातकों की कुंडली में शुक्र ही पत्नी और वैवाहिक जीवन का प्रतिनिधित्व करता है जिन पुरुषों की कुंडली में शुक्र बारहवे भाव में होता है तो ऐसे लोगों के विवाह के बाद उनका विशेष भाग्योदय होता है।
यदि कुंडली में शुक्र नीच राशि (कन्या) में हो केतु के साथ हो मंगल से पीड़ित हो, सूर्य से अस्त हो या अष्टमभाव में होने से पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति को आर्थिक संघर्ष का सामना करना पड़ता है जीवन में संपत्ति और भौतिक संसाधनों की कमी रहती है जीवन में ऐश्वर्य और वैभव नहीं आ पाता और जीवन एक समान्य स्तर से आगे नहीं बढ़ पाता। ........

यदि कुंडली में शुक्र पीड़ित होने से आर्थिक और सम्पत्तिक पक्ष से जुडी समस्याएं आ रही हों तो निम्नलिखित उपाय लाभदायक होंगे -

उपाय -

1. ॐ शुम शुक्राय नमः का नियमित जाप करें।
2. प्रतिदिन श्रीसूक्त का पाठ करें।
3. शुक्रवार को गाय को खीर खिलाएं।
4. किसी योग्य ज्योतिषी से सलाह के बाद ओपल रत्न धारण करना भी लाभदायक होगा।



फलित ज्योतिष में वर्णित अनेकग्रहयोगो में राशि–परिवर्तन योग एकबड़ा महत्वपूर्ण और ग्रहस्थिति के फलपर बहुत गहन प्रभाव डालने वाला योगहै, कुंडली में ग्रहों की कुछ विशेष स्थितिसे राशि–परिवर्तन योग बनता है कुंडलीमें जब कोई भी दो ग्रह एक दूसरे कीराशि में स्थित हों तो इसे राशि–परिवर्तनयोग कहते हैं उदाहरण के तौर पर जैसेचन्द्रमाँ धनु राशि (बृहस्पति की राशि) मेंहो और बृहस्पति कर्क राशि (चन्द्रमाँ कीराशि) में हो तो यहाँ चन्द्रमाँ औरबृहस्पति में राशि परिवर्तन हो रहा हैराशि परिवर्तन किस स्थिति में कैसाप्रभाव देगा इसके लिए ग्रहों का भावऔर भावेश की दृष्टि से भी आंकलनकरना होता है अर्थात दो ग्रह किन भावोके स्वामी होकर आपस में राशिपरिवर्तन योग बना रहे हैं।

राशि परिवर्तन योग को मुख्य रूप सेतीन स्थितियों में बाटा गया है।

महायोग – जब कुंडली मेंशुभ भावों (केंद्र,त्रिकोण,धनभाव, लाभ स्थान) के स्वामियोंअर्थात शुभ भावेशों का आपस मेंराशि परिवर्तन होता है तो इसेमहायोग कहते हैं जैसे लग्नेशपंचम भाव में हो और पंचमेशलग्न में स्थित हो तो यहाँ लग्न(प्रथम भाव) और पंचम भाव केस्वामी एक दूसरे के भाव में स्थितहैं जिससे यह राशिपरिवर्तनमहायोग की श्रेणी में आएगा इसीप्रकार धनेश दशम भाव में औरदशमेश धन भाव में हो, चतुर्थेशनवम भाव में और नवमेश चतुर्थभाव में हो तो इस प्रकार शुभभावो के स्वामियों में हुआ राशिपरिवर्तन महायोग कहलाता है।महायोग को बहुत शुभ फल देनेवाला माना गया है इससे कुंडलीका बल और साकारात्मकपरिणाम बढ़ते हैं महायोग में जिनदो भावों के स्वामियों में राशिपरिवर्तन होता है उन दोनों भावोंका बल बहुत बढ़ जाता है जिससेउस भाव से सम्बंधित कारक तत्वोंकी जीवन में अच्छी प्राप्ति होती हैजैसे यदि धनेश और दशमेश मेंराशि परिवर्तन हो तो ऐसे में व्यक्तिकी आजीविका भी अच्छी होगीकरियर में अच्छी सफलता मिलेगीतथा धन की स्थिति अर्थातआर्थिक पक्ष भी अच्छा प्राप्तहोगा, यदि यदि लग्नेश औरपंचमेश का राशि परिवर्तन हो तोइससे जीवन में अच्छा स्वास्थ, प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अच्छी शिक्षा औरअच्छे संतान सुख की प्राप्ति होगीअतः कुंडली में महायोग का बननाकुंडली के बल को बढाकर शुभपरिणाम देता है। राज योग की कुछ स्थितियां भी महायोग की श्रेणी में ही बनती हैं कुंडली में दशमेश का त्रिकोणेश अर्थात लग्नेश, पंचमेश और भाग्येश के साथ राशिपरिवर्तन राजयोग माना जाता है और व्यक्ति को समृद्धि प्रदान करता है तो राज योग की यह स्थिति भी महायोग की श्रेणी में ही आती है।दैन्य योग – यदि कुंडली पापया दुःख भावों के स्वामियों(षष्टेश,अष्टमेश,द्वादशेश) का शुभभावों के स्वामियों के साथरशिपरिवर्तन हो तो इसे दैन्य योगकहते हैं उदाहरण के तौर पर यदिअष्टमेश लग्न में स्थित हो औरलग्नेश अष्टम भाव में हो तो यहाँअष्टमेश (दुःख भाव का स्वामी) और लग्नेश (शुभ भाव का स्वामी) के बीच राशि परिवर्तन हो रहा हैजिससे यह रशिपरिवर्तन दैन्य योगकी श्रेणी में आता है इसी प्रकारपंचमेश और षष्टेश काराशिपरिवर्तन, धनेश औरद्वादशेश का राशि परिवर्तन अर्थातकिसी भी शुभ भावेश और पाप भाव के स्वामी का आपस में राशि परिवर्तन या एक दूसरे के भाव में बैठना दैन्य योग कहलाता है दैन्य योग को अच्छा नहीं माना गया है इससे संघर्ष की उत्पत्ति होती है कुंडली में दैन्य योग बनने पर शुभ भाव का स्वामी पाप भाव में होने और पाप भाव का स्वामी शुभ भाव में होने से वह शुभ भाव और उसका स्वामी पीड़ित हो जाते हैं जिससे शुभ भाव से सम्बंधित कारक तत्वों में हानि होती है और संघर्ष का सामना करना पड़ता है जैसे मन लीजिये किसी व्यक्ति की कुंडली में लग्नेश छटे भाव में है और षष्टेश लग्न में स्थित है तो यहाँ लग्नेश और षष्टेश का राशि परिवर्तन होने से लग्न और लग्नेश दोनों पीड़ित हो रहे हैं जिससे ऐसे में व्यक्ति को स्वास्थ सम्बंधित समस्याएं बहुत अधिक रहेंगी और जीवन में प्रसिद्धि प्रतिष्ठा यश आदि की कमी रहेगी। तो दैन्य योग बनना संघर्ष उत्पन्न करता है।खल-योग – कुंडली में जब तीसरे भाव के स्वामी का किसी भी शुभ भाव (केंद्र, त्रिकोण लाभ धन आदि) के स्वामी के साथ राशि परिवर्तन हो तो इसे खल योग कहते हैं उदाहरण के तौर पर यदि लग्नेश तीसरे भाव में और तृतियेश लग्न में हो, पंचमेश तीसरे भाव में और तृतियेश पंचम भाव में हो, दशमेश  तीसरे भाव में और तृतियेश दशम भाव में हो तो यह राशि परिवर्तन खल योग की श्रेणी में आता है खल योग का परिणाम दैन्य योग की तरह अति नकारात्मक तो नहीं होता पर दैन्य योग को भी अच्छा नहीं माना गया है इसमें तृतियेश का जिस शुभ भाव के स्वामी से राशि परिवर्तन होता है उस भाव के कारक तत्वों की प्राप्ति में संघर्ष या अधिक पुरुषार्थ करना पड़ता है जैसे यदि दशमेश और तृतियेश का राशिपरिवर्तन हो तो ऐसे में व्यक्ति को अपनी आजीविका या करियर क